
श्रवण कुमार पांडेय
19 अगस्त 1942: जब बलिया ने अंग्रेजी हुकूमत को दी चुनौती
बलिया। 19 अगस्त 1942 का दिन बलिया के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान इसी दिन बलिया में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनक्रांति निर्णायक मोड़ पर पहुंची। जिला कारागार का फाटक खुला और शेरे बलिया चित्तू पांडेय, राधामोहन सिंह, पंडित महानंद मिश्र, विश्वनाथ चौबे समेत सैकड़ों क्रांतिकारियों को रिहा कर दिया गया।


19 अगस्त की सुबह जिले के कोने-कोने से हजारों लोग जिला कारागार पहुंच गए थे। आंदोलनकारियों के हाथों में लाठी, भाला, बल्लम, गड़ासा, बर्छी, टांगी, खुखरी, ईंट-पत्थर समेत विभिन्न पारंपरिक हथियार थे। भीड़ के बढ़ते दबाव को देखते हुए अंग्रेज कलेक्टर निगम और पुलिस कप्तान जेल पहुंचे और क्रांतिकारी नेताओं से वार्ता के बाद जेल का फाटक खुलवा दिया।

रिहाई के बाद टाउन हाल क्रांति मैदान में विशाल जनसभा हुई। चित्तू पांडेय, राधामोहन सिंह, राधागोविंद सिंह और विश्वनाथ चौबे ने जनसमूह को संबोधित किया। नेताओं ने कहा कि यह रिहाई जनआंदोलन के दबाव का परिणाम है। आंदोलन के तेवर को देखते हुए जिले के कई थानों की पुलिस भी निष्क्रिय हो गई थी।
इसके बाद 20 अगस्त 1942 को बलिया में राष्ट्रीय सरकार के गठन की विधिवत घोषणा हुई। इसका नेतृत्व चित्तू पांडेय ने किया। जनता ने इस सरकार का समर्थन करते हुए चंदा भी एकत्र किया। इस ऐतिहासिक घटना के कारण बलिया को आज भी ‘बागी बलिया’ के नाम से याद किया जाता है।

आज भी निभाई जाती है परंपरा
19 अगस्त की इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में प्रतिवर्ष जिला प्रशासन की ओर से जिला कारागार का फाटक खोला जाता है। डीएम और एसपी की मौजूदगी में क्रांतिकारी जुलूस निकाला जाता है और स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके योगदान को याद किया जाता है।