
यूपी बजट 2026-27 पर पूर्व नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी का तीखा हमला, कहा आंकड़ों का इंद्रधनुष, जमीन पर धुंध
लखनऊ/बलिया। उत्तर प्रदेश विधानसभा में पेश हुए बजट 2026-27 को लेकर पूर्व नेता प्रतिपक्ष रामगोविन्द चौधरी ने योगी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने इसे “चुनावी लुभावन बजट” बताते हुए कहा कि यह जनता की जरूरतों का रोडमैप नहीं, बल्कि 2027 विधानसभा चुनाव से पहले “वोट बैंक साधने का दस्तावेज” है। रामगोविन्द चौधरी ने कहा कि यूपी में बजट अब वित्तीय दस्तावेज नहीं, बल्कि एक “भव्य इवेंट” बन गया है, जहां भारी-भरकम आंकड़ों के सहारे “ऐतिहासिक” और “रिकॉर्ड तोड़” जैसे दावे किए जाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि प्रदेश की सड़कों पर गड्ढे, गांवों में टूटी सड़कें, जलभराव और मूलभूत सुविधाओं की कमी जस की तस बनी हुई है।

“विज्ञापनों का विकास बनाम धरातल की दौड़”
उन्होंने कहा कि सरकार खुद को “एक्सप्रेसवे प्रदेश” बताती है, लेकिन विकास की रफ्तार विज्ञापनों में जितनी तेज दिखती है, वह ग्रामीण संपर्क मार्गों पर आकर थम जाती है। बजट का बड़ा हिस्सा चमचमाती परियोजनाओं पर खर्च हो रहा है, जबकि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी अभी भी बुनियादी समस्याओं में फंसी है।
किसानों पर जुमले, बकाया और MSP पर चुप्पी
रामगोविन्द चौधरी ने कहा कि किसानों के लिए मुफ्त बिजली और रिकॉर्ड भुगतान का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन गन्ना किसानों का बकाया आज भी करोड़ों में है। MSP पर खरीदारी कमजोर है और फसल बीमा क्लेम में भारी कटौती आम बात है। उन्होंने दावा किया कि बजट में कृषि पर 9% से कम आवंटन दिखाता है कि सरकार किसानों की असली परेशानियों को प्राथमिकता नहीं दे रही।

10 लाख रोजगार का दावा: “सिर्फ आंकड़ों का खेल”
पूर्व नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि 10 लाख रोजगार देने की घोषणा पहले भी की जा चुकी है, लेकिन जमीन पर बेरोजगारी कम नहीं हुई। सरकारी भर्तियां रुकी हैं, पेपर लीक और भर्ती घोटालों ने युवाओं को निराश किया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि युवाओं को रोजगार मांगने पर “आत्मनिर्भरता” का उपदेश दे दिया जाता है, जबकि संसाधन और अवसर नहीं दिए जाते।

महिलाओं के लिए स्कीम, सुरक्षा पर खामोशी
रामगोविन्द चौधरी ने बजट में बेटियों की शादी के लिए 1 लाख रुपये, स्कूटी, टैबलेट जैसी घोषणाओं को “दिखावा” बताया। उन्होंने कहा कि यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले अभी भी गंभीर हैं, लेकिन बजट में पुलिस सुधार, महिला सुरक्षा और हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाओं के लिए ठोस फंडिंग नहीं दिखती।
असमान विकास: शहर चमके, गांव अंधेरे में
उन्होंने कहा कि सड़क, ब्रिज और एक्सप्रेसवे पर बड़े खर्च के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन पूर्वांचल और बुंदेलखंड जैसे इलाकों में सड़कें टूटी हैं, अस्पतालों में डॉक्टर नहीं और स्कूलों में शिक्षक नहीं। बजट का बड़ा हिस्सा लखनऊ-नोएडा जैसे क्षेत्रों पर केंद्रित है, जबकि ग्रामीण इलाकों की बिजली-पानी-शिक्षा की समस्याएं वहीं की वहीं हैं।
“कागज का बजट, जुमलों की खेती”
रामगोविन्द चौधरी ने बजट को “कागज का बजट” बताते हुए कहा कि बड़ी घोषणाएं अक्सर भ्रष्टाचार, ठेकेदारों की लूट और फंड गबन में दब जाती हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों पर खर्च लगातार कम रखा गया है, जबकि कर्ज बढ़ रहा है।