
नवमी पर कन्या पूजन से पूर्ण होता है नवरात्र व्रत का संकल्प
दो से दस वर्ष तक की कन्याओं के पूजन का विशेष महत्व, बटुक भैरव के रूप में बालक का पूजन भी जरूरी



बलिया। शारदीय नवरात्र के नवमी तिथि पर हवन के साथ कन्या पूजन का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कुमारी पूजन शक्ति साधना का महत्वपूर्ण अंग है। नवरात्र व्रत रखने वाले श्रद्धालु नवमी के दिन कन्याओं को देवी स्वरूप मानकर उनका विधि-विधान से पूजन करते हैं। मान्यता है कि कन्या पूजन के बाद ही नवरात्र व्रत का संकल्प पूर्ण माना जाता है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. अखिलेश कुमार उपाध्याय, इंदरपुर, थम्हनपुरा, बलिया के अनुसार कुमारी पूजन में जाति भेद का विचार नहीं किया जाता। कन्याओं को पाद्य, अर्घ्य, धूप, कुमकुम, चंदन आदि अर्पित कर श्रद्धापूर्वक पूजन किया जाता है। इसके बाद उन्हें अन्न, वस्त्र एवं जल अर्पित कर भोजन कराया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जिस स्थान पर कन्याओं का पूजन होता है, वह स्थान पवित्र हो जाता है।



उम्र के अनुसार अलग-अलग फल की मान्यता
‘मंत्रमहोदधि’ ग्रंथ के अनुसार दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की कन्याओं का पूजन करने की परंपरा है। मान्यता के अनुसार दो वर्ष की कन्या के पूजन से धन-ऐश्वर्य, तीन वर्ष की कन्या के पूजन से धन-धान्य और चार वर्ष की कन्या के पूजन से परिवार का कल्याण होता है। पांच वर्ष की कन्या के पूजन से रोगों से मुक्ति, छह वर्ष की कन्या के पूजन से विद्या, विजय और राजयोग तथा सात वर्ष की कन्या के पूजन से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इसी तरह आठ वर्ष की कन्या के पूजन से न्यायिक मामलों में सफलता, नौ वर्ष की कन्या के पूजन से शत्रुओं पर विजय और दस वर्ष की कन्या के पूजन से सभी मनोकामनाओं की पूर्ति होने की धार्मिक मान्यता है। कन्या पूजन में बालिकाओं के साथ एक बालक को भी बैठाने की परंपरा है। इस बालक को बटुक भैरव का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता में बटुक भैरव को भगवान भैरवनाथ का सौम्य स्वरूप बताया गया है। नवरात्र के समापन पर श्रद्धालु कन्याओं और बटुक भैरव का पूजन कर उन्हें भोजन कराते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।